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SIR क्या है, और लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?

भारत का चुनाव आयोग लगभग हर राज्य की मतदाता सूची घर-घर जाकर दोबारा जांच रहा है। समर्थक कहते हैं कि इससे मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियां हटती हैं। आलोचक कहते हैं कि योग्य मतदाताओं के नाम गलत तरीके से कट रहे हैं। यहां दिन-ब-दिन बताया गया है कि क्या हुआ, स्रोतों के साथ — ताकि आप खुद राय बना सकें।

अपडेट:

  1. 1

    यह क्या है

    विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची को नए सिरे से बनाता है: अधिकारी घर-घर जाते हैं, हर मतदाता फ़ॉर्म भरता है, और जिनका मिलान पुरानी सूची से नहीं होता उन्हें दस्तावेज़ दिखाने पड़ सकते हैं।

  2. 2

    कितना बड़ा

    जून 2025 में बिहार से शुरू होकर अब यह लगभग पूरे देश में है। दूसरे चरण की अंतिम सूचियों में पहले से लगभग 5.2 करोड़ (10%) नाम कम हुए।

  3. 3

    विवाद क्यों

    विपक्ष और नागरिक समूह गलत और अपारदर्शी तरीके से नाम हटाने का आरोप लगाते हैं। चुनाव आयोग और सरकार इसे कानूनी सफ़ाई बताते हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में इसे वैध ठहराया।

SIR चरण
3बिहार (2025), 12 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश (2025–26), 19 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश (2026)
दूसरे चरण के बाद कम नाम
≈5.18 करोड़12 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 50.99 करोड़ → 45.81 करोड़ (PTI का आंकलन)
सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध माना
27 मई 2026ADR बनाम भारत निर्वाचन आयोग
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60 सेकंड में SIR

पुनरीक्षण कैसे होता है

आम तौर पर मतदाता सूची आवेदनों के ज़रिए अपडेट होती है। गहन पुनरीक्षण में हर मतदाता की दोबारा जांच होती है। नीचे दिए चरणों पर ही ज़्यादातर विवाद होते हैं।

  1. 01

    घर-घर गणना

    बूथ लेवल अधिकारी (BLO) हर सूचीबद्ध मतदाता को फ़ॉर्म देता है। जवाबों का मिलान पिछले गहन पुनरीक्षण की सूची से होता है (जैसे बिहार की 2003 की सूची)।

  2. 02

    मसौदा सूची

    जिनके फ़ॉर्म वापस नहीं आए या जिनका मिलान नहीं हुआ, वे मसौदे से बाहर रहते हैं — मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि या लापता जैसे कारणों के साथ।

  3. 03

    नोटिस और दावे

    बिना मिलान वाले या “फ़्लैग” हुए मतदाताओं को नोटिस मिलता है। फ़ॉर्म 6 से नाम जुड़वाया जाता है; फ़ॉर्म 7 से किसी नाम पर आपत्ति होती है। नाम हटाने से पहले सुनवाई ज़रूरी है।

  4. 04

    अंतिम सूची

    निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) हर मामले पर फ़ैसला करता है। मसौदे से बाहर रहे बहुत से नाम इस चरण में वापस जुड़े।

  5. 05

    अपील

    जो अब भी बाहर हैं, वे पहले ज़िला मजिस्ट्रेट और फिर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकते हैं (धारा 24, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950)।

दस्तावेज़ किसे दिखाने होते हैं?

बिहार में जिनका नाम 2003 की सूची में था, उन्हें मुख्य रूप से फ़ॉर्म भरना था। बाकी लोगों को 11 सूचीबद्ध दस्तावेज़ों में से एक दिखाना था — जैसे जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, मैट्रिक प्रमाणपत्र, जाति या निवास प्रमाणपत्र, या 1 जुलाई 1987 से पहले जारी सरकारी पहचान पत्र — और जन्म वर्ष के अनुसार माता-पिता का दस्तावेज़ भी। सितंबर 2025 में पहचान के लिए आधार को 12वें दस्तावेज़ के रूप में जोड़ा गया।

संक्षिप्त पुनरीक्षण बनाम गहन पुनरीक्षण

संक्षिप्त पुनरीक्षणगहन पुनरीक्षण (SIR)
कौन शुरू करता हैबदलाव होने पर मतदाता फ़ॉर्म भरते हैंअधिकारी हर सूचीबद्ध मतदाता के पास जाते हैं
किसकी जांचसिर्फ़ बदलने वाली प्रविष्टियांसूची की हर प्रविष्टि
मतदाता पर बोझकम — आपत्ति न हो तो नाम बना रहता हैज़्यादा — फ़ॉर्म लौटाएं; मिलान न हो तो कागज़ दिखाएं

दोनों पक्ष

कुछ लोग SIR का बचाव क्यों करते हैं और कुछ विरोध क्यों

हर पक्ष के मुख्य तर्क, उन्हीं के शब्दों में, स्रोतों के साथ। किसी तर्क को यहां रखने का मतलब यह नहीं कि सबूत उसे सही साबित करते हैं।

चुनाव आयोग और समर्थकों का कहना है

  • दो दशकों के पलायन, शहरीकरण और दर्ज न हुई मौतों से सूचियों में मृत, स्थानांतरित और दोहरे नाम जमा हो गए; कई राज्यों में पिछला गहन पुनरीक्षण 2002–05 में हुआ था।

  • संविधान वोट का अधिकार वयस्क नागरिकों तक सीमित करता है (अनुच्छेद 326), इसलिए आयोग का कहना है कि उसे पात्रता जांचनी होगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को वैध और आनुपातिक माना, क्योंकि इसमें नोटिस, सुनवाई और अपील की व्यवस्था है।

  • दावों से बहुत से नाम लौटे: उत्तर प्रदेश के मसौदे के बाद 84 लाख और बिहार में 21.5 लाख नाम जोड़े गए।

  • भाजपा और चुनाव आयोग का कहना है कि “13 करोड़” का आंकड़ा मसौदे के चरण के फ़्लैग गिनता है — जिनमें लगभग 2.8 करोड़ मृत और 1 करोड़ दोहरी प्रविष्टियां हैं — अंतिम विलोपन नहीं।

विपक्षी दलों और आलोचकों का कहना है

  • इससे पात्रता साबित करने का बोझ मतदाताओं पर आ जाता है, उन कागज़ों के साथ जो बहुत से गरीबों, प्रवासियों और महिलाओं के पास नहीं होते।

  • चुनावों के ठीक पहले इसे जल्दबाज़ी में चलाया गया, जिससे बूथ लेवल अधिकारियों पर भारी दबाव पड़ा।

  • “तार्किक विसंगति” जैसे सॉफ़्टवेयर फ़्लैग और अपने-आप बने फ़ॉर्म अपारदर्शी हैं; इनके नियम सार्वजनिक नहीं किए गए।

  • जीत के अंतर की तुलना में नाम बहुत ज़्यादा कटे, और कुछ रिपोर्टों में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप है।

  • आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल हैं: 2023 का चयन कानून और दो आयुक्तों की कथित आंतरिक आपत्तियां।

अदालतों ने क्या किया

सुप्रीम कोर्ट ने SIR को चलने दिया, लेकिन छूटे नाम और कारण प्रकाशित करने का आदेश दिया, आधार को दस्तावेज़ के रूप में जोड़ा, पश्चिम बंगाल के विवादित मामलों के फ़ैसले के लिए न्यायाधीश लगाए और मई 2026 में SIR को वैध ठहराया। इसके अमल पर नई याचिकाएं लंबित हैं।

दिन-ब-दिन

समयरेखा

हर प्रविष्टि दो-तीन पंक्तियों में बताती है कि क्या हुआ, साथ में सबूत की स्थिति और स्रोत। अहम मोड़ अलग से उभारे गए हैं।

दिसंबर 2023

  1. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    नए कानून से चुनाव आयुक्तों के चयन का तरीका बदला।

    चयन समिति में अब प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और नेता प्रतिपक्ष होंगे; भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह मंत्री आए। आलोचकों का कहना है कि इससे समिति में सरकार का बहुमत हो जाता है।

मार्च 2024

  1. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू चुनाव आयुक्त बने।

    नई समिति ने उन्हें चुना। समिति के विपक्षी सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने शॉर्टलिस्ट साझा करने के तरीके पर असहमति दर्ज की।

    स्रोतThe Wire

फ़रवरी 2025

  1. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।

    नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के असहमति पत्र में 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई तक इंतज़ार करने को कहा गया था।

    स्रोतThe Tribune

जून 2025

  1. बिहारआधिकारिक रिकॉर्ड

    चुनाव आयोग ने बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का आदेश दिया।

    आयोग ने शहरीकरण, पलायन, दर्ज न हुई मौतों और “विदेशी अवैध प्रवासियों” के नामों का हवाला दिया। 2003 की सूची वाले 4.96 करोड़ लोगों को मुख्यतः फ़ॉर्म भरना था; बाकी को दस्तावेज़ दिखाने थे।

जुलाई 2025

  1. बिहारअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने पहली चुनौतियां सुनीं और SIR को जारी रहने दिया।

    अदालत ने आयोग से आधार, मतदाता पहचान पत्र (EPIC) और राशन कार्ड को दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करने पर विचार करने को कहा।

    स्रोतLiveLawETV Bharat
  2. बिहारअदालत

    अदालत ने बिहार की मसौदा सूची का प्रकाशन रोकने से इनकार किया।

    न्यायाधीशों ने कहा कि आधार और मतदाता पहचान पत्र को असली माना जा सकता है, जबकि राशन कार्ड की जालसाज़ी आसान है।

    स्रोतLiveLawETV Bharat

अगस्त 2025

  1. बिहारआधिकारिक रिकॉर्ड

    बिहार की मसौदा सूची आई: लगभग 65 लाख नाम गायब।

    मसौदे में 7.24 करोड़ मतदाता हैं, जबकि पहले 7.89 करोड़ थे। आयोग ने मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि और “लापता” को कारण बताया।

    स्रोतThe WireLiveLaw
  2. कर्नाटकआरोप

    राहुल गांधी ने महादेवपुरा पर अपना “वोट चोरी” दावा पेश किया।

    उनका आरोप है कि 2024 लोकसभा चुनाव में बेंगलुरु की इस सीट पर 1,00,250 फ़र्ज़ी प्रविष्टियां थीं: दोहरे नाम, फ़र्ज़ी पते, एक पते पर थोक मतदाता, अमान्य फ़ोटो और फ़ॉर्म 6 का दुरुपयोग।

    स्रोतDeccan Herald
  3. कर्नाटकरिपोर्ट

    अधिकारियों ने “मकान नंबर 35” की जांच की, जिसका ज़िक्र गांधी ने किया था।

    बूथ लेवल अधिकारियों को इस छोटे किराए के मकान में दर्ज 80 मतदाताओं में से कोई नहीं मिला। एक ने कहा कि आसपास रहने वालों ने यह पता दस्तावेज़ी सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया होगा।

    स्रोतThe Week
  4. बिहारअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने 65 लाख छूटे नामों को कारणों सहित प्रकाशित करने का आदेश दिया।

    सूचियां मतदाता पहचान संख्या से खोजी जा सकनी चाहिए, और सार्वजनिक सूचना में बताना होगा कि दावे के लिए आधार दिया जा सकता है।

    स्रोतLiveLaw
  5. अखिल भारतआधिकारिक जवाब

    मुख्य चुनाव आयुक्त ने राहुल गांधी से कहा: शपथपत्र दें या माफ़ी मांगें।

    ज्ञानेश कुमार ने सात दिन दिए और कहा कि शपथपत्र के बिना दावे निराधार माने जाएंगे। उन्होंने माना कि सूचियों में गलतियां हो सकती हैं और SIR को उन्हें सुधारने का रास्ता बताया।

    स्रोतThe Week (PTI)
  6. बिहाररिपोर्ट

    विपक्षी नेताओं ने बिहार में “वोटर अधिकार यात्रा” शुरू की।

    राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने सासाराम से लगभग 1,300 किमी की यात्रा निकाली, यह आरोप लगाते हुए कि SIR गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम हटाएगा।

    स्रोतThe Tribune

सितंबर 2025

  1. बिहारअदालत

    बिहार के SIR में आधार 12वां मान्य दस्तावेज़ बना।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह पहचान साबित करता है, लेकिन “इसे नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा”, और अधिकारी कार्ड की असलियत जांच सकते हैं।

    स्रोतLiveLaw
  2. कर्नाटकआधिकारिक जवाब

    आलंद, कर्नाटक: गांधी ने संगठित तरीके से नाम कटवाने की कोशिश का आरोप लगाया; आयोग ने जवाब दिया।

    आयोग का कहना है कि 2023 में 6,018 ऑनलाइन विलोपन अनुरोध आए, केवल 24 असली थे, FIR दर्ज हुई, और कोई भी आम व्यक्ति ऑनलाइन वोट नहीं हटा सकता।

    स्रोतNews On AIR
  3. केरलआधिकारिक रिकॉर्ड

    केरल विधानसभा ने SIR के ख़िलाफ़ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया।

    सत्तारूढ़ LDF और विपक्षी UDF दोनों ने समर्थन किया, इसे जल्दबाज़ी भरा बताया और चेताया कि यह “पिछले दरवाज़े से NRC” बन सकता है।

    स्रोतThe Wire
  4. बिहारआधिकारिक रिकॉर्ड

    बिहार की अंतिम सूची: 7.42 करोड़ मतदाता।

    मसौदे के बाद फ़ॉर्म 6 से 21.53 लाख नाम जुड़े और 3.66 लाख और हटे — जून की तुलना में लगभग 47 लाख (6%) की शुद्ध कमी।

    स्रोतThe Wire

अक्टूबर 2025

  1. कर्नाटकजांच

    कर्नाटक की विशेष जांच टीम (SIT) ने आलंद में पैसे लेकर नाम कटवाने के तंत्र की बात कही।

    जांचकर्ताओं के अनुसार कलबुर्गी के एक डेटा सेंटर को हर विलोपन आवेदन के लिए लगभग ₹80 दिए गए।

    स्रोतThe Federal
  2. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    SIR देशभर में: दूसरा चरण 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में।

    लगभग 51 करोड़ मतदाता, जिनमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान शामिल हैं। असम के लिए अलग प्रक्रिया।

    स्रोतNews On AIR

नवंबर 2025

  1. तमिलनाडुअदालत

    DMK ने तमिलनाडु में SIR रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी ने इसे असंवैधानिक और मनमाना बताया; अदालत सुनवाई के लिए तैयार हुई।

    स्रोतThe Tribune
  2. हरियाणाविवादित

    “एच फ़ाइल्स”: गांधी ने हरियाणा की 2024 की सूची में 25 लाख फ़र्ज़ी प्रविष्टियों का आरोप लगाया।

    उनका कहना है कि एक ब्राज़ीलियाई मॉडल की स्टॉक फ़ोटो 22 बार आई। आयोग ने जवाब दिया कि सूची के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं हुई और पूछा कि कांग्रेस के एजेंटों ने आपत्ति क्यों नहीं की।

    स्रोतETV BharatThe Tribune
  3. बिहारआधिकारिक रिकॉर्ड

    SIR के बाद बिहार में मतदान: NDA ने 243 में से 202 सीटें जीतीं।

    मतदान 67.13% रहा, जिसे 1951 के बाद सबसे ज़्यादा बताया गया। केवल नतीजे से यह पता नहीं चलता कि SIR से किसी पक्ष को फ़ायदा हुआ या नुकसान।

    स्रोतNews On AIR
  4. असमआधिकारिक रिकॉर्ड

    असम में SIR नहीं, “विशेष पुनरीक्षण” होगा।

    आयोग ने असम के लिए नागरिकता के अलग प्रावधानों का हवाला दिया। वहां नागरिकता के आधार पर नाम हटाने के लिए विदेशी न्यायाधिकरण या अदालत का आदेश ज़रूरी है।

    स्रोतScroll
  5. अखिल भारतविवादित

    बूथ लेवल अधिकारियों की मौतें बड़ा मुद्दा बनीं।

    मीडिया की गिनती के अनुसार दूसरे चरण के पहले हफ़्तों में कम से कम 11 BLO की मौत हुई; परिवारों ने काम के दबाव की बात कही, दलों के दावे इससे ज़्यादा हैं। अधिकारी सीधे संबंध से इनकार करते हैं।

    स्रोतNewslaundrySiasat

दिसंबर 2025

  1. अखिल भारतअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से SIR ड्यूटी के लिए और कर्मचारी देने को कहा।

    TVK की याचिका पर अदालत ने कहा कि राज्यों को कर्मचारी उपलब्ध कराने होंगे और छूट मांगने वालों की जगह दूसरे लगाए जा सकते हैं।

    स्रोतThe Tribune
  2. कर्नाटकजांच

    आलंद मामले के आरोपपत्र में पूर्व भाजपा विधायक, उनके बेटे और पांच अन्य के नाम।

    SIT ने सुभाष गुत्तेदार और अन्य पर 2022–23 में लगभग 5,994 मतदाताओं के नाम कटवाने की साज़िश का आरोप लगाया। वे आरोपों से इनकार करते हैं। आरोपपत्र दोषसिद्धि नहीं है।

जनवरी 2026

  1. उत्तर प्रदेशआधिकारिक रिकॉर्ड

    उत्तर प्रदेश की मसौदा सूची: 15.44 करोड़ से घटकर 12.56 करोड़।

    लगभग 2.89 करोड़ नाम मसौदे में नहीं हैं। दावों और आपत्तियों से योग्य मतदाता अब भी वापस जुड़ सकते हैं।

  2. उत्तर प्रदेशरिपोर्ट

    तरबगंज, उत्तर प्रदेश: एक ही नाम से 188 विलोपन अनुरोध।

    बाद की एक पत्रकारीय जांच में “रेशमा” के नाम से 188 फ़ॉर्म 7 मिले, सभी एक ही बूथ के मतदाताओं के ख़िलाफ़। UP के CEO का कहना है कि गड़बड़ी पकड़ी गई और सभी अनुरोध ख़ारिज हुए।

फ़रवरी 2026

  1. पश्चिम बंगालअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के विवादित मामलों के लिए न्यायाधीश लगाए।

    परिस्थितियों को “असाधारण” बताते हुए अदालत ने कलकत्ता हाई कोर्ट से “तार्किक विसंगति” वाले मतदाताओं की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारी लगाने को कहा।

    स्रोतNews On AIR
  2. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    दूसरे चरण के नौ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम सूचियां आईं।

    सबसे बड़ी गिरावट गुजरात में (68.1 लाख, 13.4%), फिर मध्य प्रदेश (लगभग 34 लाख) और राजस्थान (31.3 लाख)।

    स्रोतScroll
  3. तमिलनाडुआधिकारिक रिकॉर्ड

    तमिलनाडु की अंतिम सूची: 5.67 करोड़, लगभग 74 लाख कम।

    मसौदे में 5.44 करोड़ थे; दावों के दौरान 27.53 लाख जुड़े। जिनके नाम कटे, वे 15 दिन में ज़िला मजिस्ट्रेट के पास अपील कर सकते हैं।

    स्रोतThe South First
  4. पश्चिम बंगालआधिकारिक रिकॉर्ड

    पश्चिम बंगाल की अंतिम सूची: 63.66 लाख नाम हटने के बाद 7.04 करोड़।

    लगभग 60 लाख और मतदाता “न्यायिक निर्णय के अधीन” रहे, जबकि न्यायिक अधिकारी उनके मामले तय कर रहे थे।

    स्रोतDeccan Chronicle (PTI)

अप्रैल 2026

  1. पश्चिम बंगालआधिकारिक रिकॉर्ड

    न्यायिक समीक्षा के बाद पश्चिम बंगाल में कुल विलोपन लगभग 90.8 लाख।

    जिन 60.06 लाख मतदाताओं के मामले तय हुए, उनमें 27.16 लाख के नाम हटे और 32.68 लाख बने रहे। अपील न्यायाधिकरणों में जाती है।

    स्रोतThe Week
  2. उत्तर प्रदेशआधिकारिक रिकॉर्ड

    उत्तर प्रदेश की अंतिम सूची: 13.40 करोड़ — मसौदे से 84 लाख ज़्यादा।

    फिर भी यह SIR से पहले की तुलना में लगभग 2.04 करोड़ कम है — किसी भी राज्य में सबसे बड़ी गिरावट।

मई 2026

  1. पश्चिम बंगालआधिकारिक रिकॉर्ड

    पश्चिम बंगाल में मतदान: भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीतीं, TMC का 15 साल का शासन ख़त्म।

    SIR की भूमिका पर विश्लेषक बंटे हैं: Scroll के अनुसार भाजपा की जीती लगभग आधी सीटों पर कटे नाम जीत के अंतर से ज़्यादा थे; हिंदुस्तान टाइम्स के विश्लेषण के अनुसार SIR निर्णायक नहीं था।

  2. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    तीसरे चरण की घोषणा: 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश, लगभग 36.7 करोड़ मतदाता।

    इसमें दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। केवल हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बाद के लिए बचे हैं।

    स्रोतThe Week
  3. अखिल भारतअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध ठहराया।

    अदालत ने कहा कि आयोग मतदाता सूची के लिए नागरिकता की जांच कर सकता है, लेकिन नाम कटना नागरिकता खोना नहीं है; संदिग्ध मामले सक्षम प्राधिकारी को जाएंगे। आलोचकों का कहना है कि इससे मतदाताओं को बहुत कम सुरक्षा मिलती है।

जुलाई 2026

  1. अखिल भारतरिपोर्ट

    संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों ने SIR पर सवाल उठाए।

    संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेषज्ञों ने अपारदर्शी तरीकों और अल्पसंख्यकों को बाहर करने पर चिंता जताई। विदेश मंत्रालय ने आरोपों को निराधार बताया और सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी का हवाला दिया।

    स्रोतThe Indian Express

सितंबर 2026

  1. अखिल भारतविवादित

    रिपोर्ट: दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार लिखित आपत्ति की।

    इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उनके बिना लिए गए SIR फ़ैसलों पर आपत्ति की। आयोग का कहना है कि अहम फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए और वे नोट “सुझाव” थे।

  2. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    आयोग ने नौ बदलावों की घोषणा की, जिनमें ECINET सॉफ़्टवेयर की समीक्षा शामिल है।

    इनमें आयोग की बैठकों के लिए अनिवार्य एजेंडा और कार्यवृत्त, और दिल्ली व महाराष्ट्र में SIR की समय-सीमा बढ़ाना शामिल है।

    स्रोतOutlook

अक्टूबर 2026

  1. गोवाआधिकारिक जवाब

    गोवा: सॉफ़्टवेयर की गड़बड़ी से 97 मतदाता छूटे; आयोग के अनुसार 88 वापस जुड़े।

    आयोग का कहना है कि बाकी में से तीन लोग पुर्तगाली नागरिक हैं।

    स्रोतThe Times of India
  2. अखिल भारतअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने CEC को निलंबित करने से इनकार किया, लेकिन जवाब मांगा।

    उस याचिका पर नोटिस जारी हुआ जिसमें कहा गया है कि SIR के अहम फ़ैसले बाकी आयुक्तों के बिना हुए; अदालत ने कहा कि वह सिर्फ़ अख़बारी रिपोर्टों के आधार पर आदेश नहीं दे सकती।

    स्रोतNews On AIRThe Week
  3. दिल्लीरिपोर्ट

    CEC के इस्तीफ़े की मांग वाले प्रदर्शन में राहुल गांधी और विपक्षी सांसद हिरासत में लिए गए।

    दो दिनों में यह उनकी तीसरी हिरासत थी। सरकार और आयोग किसी राजनीतिक मंशा से इनकार करते हैं और कहते हैं कि SIR दोहरी और अयोग्य प्रविष्टियां हटाता है।

    स्रोतAl Jazeera
  4. उत्तर प्रदेशविवादित

    जांच: उत्तर प्रदेश में 87,127 विलोपन फ़ॉर्म बिना कारण अपने-आप बने।

    द रिपोर्टर्स कलेक्टिव का कहना है कि सुनवाई के बाद आयोग के सॉफ़्टवेयर ने इन्हें अधिकारियों के हस्ताक्षर से बनाया। UP के CEO का कहना है कि ये नोटिस और सुनवाई के बाद कानूनी रूप से लिए गए फ़ैसलों का रिकॉर्ड हैं।

  5. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    आयोग ने विलोपन अनुरोधों की सीमा प्रति व्यक्ति 10 तय की।

    यह सीमा पूरी दावा अवधि के लिए है (नियमित अपडेट में महीने में पांच), कर्नाटक और ओडिशा में थोक आपत्तियों की रिपोर्टों के बाद। अधिकारियों को हर आपत्तिकर्ता की सुनवाई करनी होगी।

  6. केरलआधिकारिक रिकॉर्ड

    केरल विधानसभा ने CEC को हटाने की मांग की।

    मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने प्रस्ताव रखा; भाजपा के तीन विधायकों ने विरोध किया। इसे किसी राज्य विधानसभा का ऐसा पहला प्रस्ताव बताया गया।

    स्रोतThe News Minute
  7. अखिल भारतअदालत

    INDIA गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

    वे SIR पर रोक, सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अगुवाई में विलोपनों का ऑडिट, कारणों सहित कटे नामों की बूथवार सूची, और नोटिस-सुनवाई के बिना कोई विलोपन न होने की मांग करते हैं।

    स्रोतIBTimes India
  8. दिल्लीरिपोर्ट

    जंतर-मंतर अब प्रदर्शन स्थल नहीं; युवा आंदोलन के दो नेता जेल भेजे गए।

    “कॉकरोच जनता पार्टी” आंदोलन के नेताओं को बैरिकेड लांघकर परिसर में घुसने के बाद पांच दिन के लिए जेल भेजा गया।

    स्रोतThe Week
  9. अखिल भारतअदालत

    सुप्रीम कोर्ट ने INDIA गठबंधन की याचिका पर नोटिस जारी किया।

    SIR पर रोक का कोई आदेश रिपोर्ट नहीं हुआ। अदालत ने एक याचिकाकर्ता संजय राउत से अपने आचरण पर सफ़ाई देने को कहा।

    स्रोतLiveLaw
  10. अखिल भारतआधिकारिक रिकॉर्ड

    अगला कदम: 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण।

    दलों को सूचियां चित्र की जगह खोजने योग्य टेक्स्ट PDF में मिलेंगी — जिसकी मांग विपक्ष वर्षों से कर रहा था।

    स्रोतThe WeekThe Wire
  11. कर्नाटकरिपोर्ट

    कर्नाटक का विश्लेषण: “ख़ुद को मृत घोषित करते” मतदाता।

    द हिंदू को 37 लोग मिले जिन्होंने ख़ुद को मृत बताकर अपना नाम हटाने का फ़ॉर्म 7 भरा, और 334 जोड़े जिन्होंने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ फ़ॉर्म भरा। कितने नाम असल में हटे, यह पता नहीं है।

  12. उत्तर प्रदेशआधिकारिक रिकॉर्ड

    पीलीभीत, उत्तर प्रदेश: वही मतदाता पहचान संख्या, अलग नाम।

    कांग्रेस का कहना है कि अंतिम सूची के बाद 13,150 प्रविष्टियां बदली गईं। UP के CEO ने इसे तकनीकी विसंगति बताया, एक ERO और एक ऑपरेटर को ड्यूटी से हटाया और राज्यभर में जांच का आदेश दिया।

    स्रोतThePrint (PTI)The Wire
  13. उत्तर प्रदेशआधिकारिक रिकॉर्ड

    पीलीभीत पर आगे की कार्रवाई: 10,470 प्रविष्टियों को लेकर दो ERO पर कार्रवाई।

    एक कंप्यूटर सहायक बर्ख़ास्त हुआ और 10 अप्रैल से उसके दर्ज किए हर फ़ॉर्म 6 और फ़ॉर्म 7 की दोबारा जांच होगी।

    स्रोतSiasat (PTI)

आगे क्या

घोषित तारीखें — पिछले अपडेट तक ये हुई नहीं हैं।

  1. कर्नाटक की SIR की अंतिम सूची आनी है।अक्टूबर के मध्य तक लगभग 43.8 लाख नोटिस जारी हो चुके थे।
    निर्धारित
  2. कांग्रेस और सहयोगी दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली की योजना बना रहे हैं।पुलिस ने अनुमति दी है। प्रस्तावित कार्यक्रम को हो चुकी घटना न समझें।
    निर्धारित
  3. विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण की मसौदा सूचियां।दावे और आपत्तियां 11 दिसंबर 2026 तक।
    निर्धारित
  4. विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण की अंतिम सूचियां।अर्हता तिथि: 1 जनवरी 2027।
    निर्धारित

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बिहार

पहला चरण · बिहार. 24 जून 2025 को आदेश; अंतिम सूची 30 सितंबर 2025।

  • पहला चरण · बिहार24 जून 2025 को आदेश; अंतिम सूची 30 सितंबर 2025।
  • दूसरा चरण27 अक्टूबर 2025 को 12 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लिए घोषणा; अंतिम सूचियां फ़रवरी–अप्रैल 2026।
  • तीसरा चरण14 मई 2026 को 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए घोषणा; 30 मई 2026 से चरणबद्ध।
  • विशेष पुनरीक्षणअसम: SIR नहीं, अलग “विशेष पुनरीक्षण”, 17 नवंबर 2025 को घोषित।
  • अभी तय नहींजनगणना और मौसम का हवाला देकर कार्यक्रम बाद में घोषित होगा।

आंकड़े

सूचियां कितनी छोटी हुईं?

SIR से पहले और अंतिम सूची में मतदाता, करोड़ में। सूची का छोटा होना अपने-आप में अवैध विलोपन का सबूत नहीं है: इसमें मौतें, पलायन और दोहरी प्रविष्टियां भी शामिल हैं, और गलत तरीके से हटे नाम भी।

  • बिहार (पहला चरण)

    आधिकारिक रिकॉर्ड
    शुद्ध बदलाव −47 लाख (−6.0%)मसौदा 7.24 करोड़ था; दावों से 21.53 लाख वापस जुड़े।
  • दूसरा चरण कुल, 12 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश

    रिपोर्ट
    शुद्ध बदलाव −5.18 करोड़ (−10.2%)अंतिम सूचियों का PTI आंकलन; लगभग 66.9 लाख नाम मृत के रूप में हटे।
  • उत्तर प्रदेश

    आधिकारिक रिकॉर्ड
    शुद्ध बदलाव −2.04 करोड़ (−13.2%)मसौदा 12.56 करोड़; दावों के बाद अंतिम सूची 84 लाख ज़्यादा।
  • पश्चिम बंगाल

    आधिकारिक रिकॉर्ड
    शुद्ध बदलाव −61.8 लाख (−8.1%)28 फ़रवरी की अंतिम सूची। न्यायिक निर्णय के बाद 7 अप्रैल तक कुल विलोपन ≈90.8 लाख।
  • तमिलनाडु

    आधिकारिक रिकॉर्ड
    शुद्ध बदलाव −74.1 लाख (−11.6%)मसौदा 5.44 करोड़; दावों के दौरान 27.53 लाख जुड़े।
  • गुजरात

    आधिकारिक रिकॉर्ड
    शुद्ध बदलाव −68.1 लाख (−13.4%)21 फ़रवरी को घोषित नौ राज्यों में सबसे बड़ी प्रतिशत गिरावट (13.4%)।
  • मध्य प्रदेश

    रिपोर्ट
    शुद्ध बदलाव −34.3 लाख (−6.0%)रिपोर्टों में 34.2–34.4 लाख; दिखाए गए आंकड़े पूर्णांकित हैं।
  • राजस्थान

    आधिकारिक रिकॉर्ड
    शुद्ध बदलाव −31.3 लाख (−5.7%)21 फ़रवरी की रिपोर्ट के अनुसार 31.3 लाख कम।

केस फ़ाइलें

बड़े दावे, जांच के साथ

हर फ़ाइल में दावा, वह सबूत जिसे हम जांच सके, जवाब, और जो अभी अनसुलझा है।

कर्नाटक · बेंगलुरु सेंट्रलआरोप

महादेवपुरा: कई श्रेणियों से बना एक बड़ा आंकड़ा

दावाराहुल गांधी ने कहा कि 2024 लोकसभा चुनाव में महादेवपुरा की 1,00,250 प्रविष्टियां फ़र्ज़ी थीं — दोहरे नाम, अमान्य पते, थोक मतदाता, फ़ोटो की समस्या और फ़ॉर्म 6 का दुरुपयोग मिलाकर।

अभी स्थितिपते के स्तर पर गड़बड़ी: रिपोर्ट हुई। कुल संख्या, वोटों पर असर और मंशा: अनसुलझे।

कर्नाटक · आलंदजांच

आलंद: नाम कटवाने की कोशिश जो आरोपपत्र तक पहुंची

दावाविपक्ष का कहना है कि 2023 विधानसभा चुनाव से पहले आलंद में दाखिल 6,018 फ़ॉर्म 7 संगठित तरीके से नाम कटवाने की कोशिश दिखाते हैं।

अभी स्थितिफ़र्ज़ी आवेदन की कोशिश: आधिकारिक रिकॉर्ड और आरोपपत्र से समर्थित। दोष का फ़ैसला अदालत करेगी; बड़े पैमाने पर विलोपन नहीं हुआ।

हरियाणा · “एच फ़ाइल्स”विवादित

हरियाणा: सार्वजनिक ऑडिट के बिना एक बड़ा आंकड़ा

दावाराहुल गांधी ने हरियाणा की 2024 की सूची में 25 लाख फ़र्ज़ी प्रविष्टियों का आरोप लगाया और कहा कि एक ब्राज़ीलियाई मॉडल की फ़ोटो 22 बार आई।

अभी स्थितिविवादित। गलत प्रविष्टियों के उदाहरण हैं; कुल संख्या सत्यापित नहीं। अपील न होना यह साबित नहीं करता कि सूची सही थी।

बिहार · पहला चरणअदालत

बिहार: पहली और अदालत की सबसे क़रीबी निगरानी वाली परीक्षा

दावामसौदा सूची से लगभग 65 लाख नाम बाहर रहे, जिससे डर पैदा हुआ कि सही दस्तावेज़ न रखने वाले अपना वोट खो देंगे।

अभी स्थितिपैमाना और अदालत के निर्देश सत्यापित हैं। हर व्यक्ति को बाहर करना उचित था या नहीं, यह मामले-दर-मामले का सवाल है जिसका जवाब कुल आंकड़े नहीं दे सकते।

पश्चिम बंगालविवादित

पश्चिम बंगाल: न्यायाधीशों की भूमिका, फिर चुनाव

दावाTMC और आलोचकों का कहना है कि सॉफ़्टवेयर फ़्लैग ने 2026 के चुनाव से पहले लाखों योग्य मतदाताओं — जिनमें बहुत से मुसलमान और प्रवासी हैं — को “न्यायिक निर्णय” में और फिर सूची से बाहर धकेला।

अभी स्थितिविलोपन के आंकड़े और अपीलों का ढेर रिकॉर्ड में है। SIR ने नतीजा बदला या नहीं, यह सिर्फ़ अंतर से साबित नहीं हो सकता।

अखिल भारतविवादित

“13 करोड़ नाम कटे”: यह आंकड़ा क्या गिनता है

दावाविपक्षी नेता और याचिकाकर्ता कहते हैं कि SIR के चरणों में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे गए।

अभी स्थितिफ़्लैग हुए नामों का आकार सहमत है; कितने योग्य मतदाता अंत में हटे, यह पता नहीं।

उत्तर प्रदेश · फ़ॉर्म 7 के आंकड़ेविवादित

उत्तर प्रदेश: सॉफ़्टवेयर रिकॉर्ड और “कोई कारण नहीं” का मतलब

दावाद रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 87,127 फ़ॉर्म 7 विलोपन प्रविष्टियां गिनीं जो अधिकारियों के लॉगिन से बनीं और सार्वजनिक डेटा में कोई कारण नहीं दिखाती थीं, और उन्हें कानूनन ग़लत बताया।

अभी स्थितिपारदर्शिता पर असली विवाद। सॉफ़्टवेयर ने ख़ुद योग्य मतदाताओं को गैरकानूनी रूप से हटाया, यह सिर्फ़ सार्वजनिक डेटा से साबित नहीं होता।

कई राज्यरिपोर्ट

एक आवेदक, सैकड़ों फ़ॉर्म 7

दावारिपोर्टें उत्तर प्रदेश के एक बूथ में एक ही नाम से 188 फ़ॉर्म 7 और कर्नाटक में कुछ दिनों में हज़ारों फ़ॉर्म दाखिल होने का ब्योरा देती हैं।

अभी स्थितिथोक आवेदन कुछ जगहों पर दर्ज हैं। इनसे बड़े पैमाने पर सफल विलोपन नहीं दिखता।

कर्नाटक · अक्टूबर 2026रिपोर्ट

फ़ॉर्म 7 भरते “मृत मतदाता”

दावाएक विश्लेषण में 37 लोग मिले जिन्होंने ख़ुद को मृत बताते हुए फ़ॉर्म 7 भरा, और 334 जोड़े जिन्होंने एक-दूसरे को मृत बताया।

अभी स्थितिडेटा की गुणवत्ता या दुरुपयोग का गंभीर संकेत। पूरे हुए विलोपन और ज़िम्मेदारी अनसुलझे हैं।

उत्तर प्रदेश · पीलीभीतआधिकारिक रिकॉर्ड

वही मतदाता पहचान, अलग नाम

दावाकांग्रेस का आरोप है कि अंतिम सूची के बाद पीलीभीत की 13,150 प्रविष्टियों में उसी पहचान और क्रम संख्या के साथ नाम बदले गए।

अभी स्थितिगड़बड़ियां और आधिकारिक कार्रवाई सत्यापित हैं। जानबूझकर हेराफेरी साबित नहीं; समीक्षा के नतीजों का इंतज़ार है।

चुनाव आयोगविवादित

आयोग के भीतर आपत्तियां

दावाइंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि आयुक्त संधू और जोशी ने 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्ति की, जिनमें फ़ॉर्म 6 में बदलाव, विलोपन और सॉफ़्टवेयर पहुंच के मुद्दे शामिल थे।

अभी स्थितिविवादित। अगर आपत्तियां हुई भी हों, तो वे अपने-आप में गैरकानूनी कार्रवाई या बदले नतीजे साबित नहीं करतीं।

अखिल भारत · कार्यभारविवादित

दबाव में बूथ लेवल अधिकारी

दावापरिवारों और दलों ने कई BLO की मौतों, जिनमें आत्महत्याएं भी हैं, को SIR के काम के दबाव से जोड़ा।

अभी स्थितिकाम का दबाव अच्छी तरह दर्ज है; हर मौत का कारण विवादित है और इसके लिए आधिकारिक जांच ज़रूरी है।

कानून और अदालतें

कानून क्या कहता है

आयोग के पास मतदाता सूचियों पर व्यापक अधिकार हैं, लेकिन कानून प्रक्रिया भी तय करता है। अदालत का आदेश, याचिका और राजनीतिक बयान अलग-अलग चीज़ें हैं।

अनुच्छेद 324, संविधान

सरल शब्दों मेंआयोग चुनावों और सूचियों की तैयारी का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है।

यहां क्यों अहमSIR का आधार; यह प्रक्रियागत सुरक्षा या अदालत की समीक्षा ख़त्म नहीं करता।

अनुच्छेद 326, संविधान

सरल शब्दों मेंवयस्क नागरिक वोट दे सकते हैं, कानून द्वारा तय अयोग्यताओं के अधीन।

यहां क्यों अहमआयोग नागरिकता क्यों जांचता है; सिर्फ़ सॉफ़्टवेयर फ़्लैग से योग्य मतदाता बाहर नहीं हो सकता।

धारा 21(3), जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950

सरल शब्दों मेंआयोग कारण दर्ज करके किसी भी समय किसी भी सूची का विशेष पुनरीक्षण करवा सकता है।

यहां क्यों अहमSIR के लिए उद्धृत कानूनी आधार।

निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960

सरल शब्दों मेंप्रकाशन, दावे, आपत्तियां, नोटिस और सुनवाई तय करते हैं।

यहां क्यों अहमफ़ॉर्म 7 दाखिल होना विलोपन नहीं है; नोटिस और जवाब का मौका ज़रूरी है।

धारा 24, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950

सरल शब्दों मेंअपील: पहले ज़िला मजिस्ट्रेट, फिर मुख्य निर्वाचन अधिकारी।

यहां क्यों अहमअंतिम सूची से बाहर रहे किसी भी व्यक्ति का रास्ता।

धारा 31, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950

सरल शब्दों मेंसूची के काम में झूठी घोषणा करना दंडनीय अपराध है।

यहां क्यों अहमफ़र्ज़ी फ़ॉर्म 7 पर मुकदमा चल सकता है — जैसा आलंद में आरोप है।

धारा 32, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950

सरल शब्दों मेंसूची के काम में कर्तव्य भंग करने वाले अधिकारियों को सज़ा हो सकती है।

यहां क्यों अहमअनुशासनात्मक कार्रवाई (जैसे पीलीभीत में) साबित अपराध से अलग है।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्त अधिनियम, 2023

सरल शब्दों मेंचयन समिति तय करता है और आयुक्तों को आधिकारिक कामों के लिए छूट देता है (धारा 16)।

यहां क्यों अहम2026 की स्वतंत्रता बहस के केंद्र में; इससे जुड़ी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में हैं।

शेयर करने से पहले

सात अंतर जो गलत निष्कर्ष से बचाते हैं

1क्या छोटी सूची का मतलब अवैध विलोपन है?संदर्भ

नहीं। शुद्ध बदलाव में मौतें, पलायन, दोहरी प्रविष्टियां और सुधार भी शामिल हैं, और गलत तरीके से हटे नाम भी। यह गहराई से देखने का कारण है, सबूत नहीं।

2क्या कोई फ़ॉर्म 7 से ऑनलाइन मेरा नाम हटा सकता है?प्रक्रिया

वे ऑनलाइन आपत्ति दाखिल कर सकते हैं, लेकिन अधिकारी को जांच, नोटिस और फ़ैसला करना होता है। आवेदन करना नाम हटाना नहीं है।

3क्या आधार नागरिकता साबित करता है?अदालत

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे SIR में पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया, नागरिकता के नहीं।

4क्या सूची से नाम कटने का मतलब नागरिकता खोना है?अदालत

नहीं। मई 2026 का फ़ैसला कहता है कि सूची से नाम कटना चुनावी फ़ैसला है, नागरिकता का नहीं; संदिग्ध मामले सक्षम प्राधिकारी को जाते हैं।

5क्या गलत प्रविष्टियों के उदाहरण वोट चोरी साबित करते हैं?सबूत

नहीं। वे डेटा की समस्या साबित कर सकते हैं। अपने-आप में वे यह नहीं दिखाते कि किसी ने फ़र्ज़ी वोट डाला या नतीजा बदला।

6क्या सुप्रीम कोर्ट ने हर विलोपन को सही कहा?अदालत

नहीं। अदालत ने SIR चलाने की शक्ति को वैध माना। व्यक्तिगत मामले, अपीलें और अमल पर नई याचिकाएं जारी हैं।

7अगर शपथपत्र या अपील नहीं दी गई, तो क्या दावा झूठा है?संदर्भ

ज़रूरी नहीं। इससे दावे की आधिकारिक जांच सीमित होती है, लेकिन यह निष्कर्ष नहीं कि मूल चिंता गलत है।

कौन क्या करता है

  • भारत निर्वाचन आयोग

    SIR का आदेश देता है, नियम और सॉफ़्टवेयर तय करता है, अदालतों को जवाब देता है।

    आयोग का फ़ैसला अपने-आप सरकार का फ़ैसला नहीं है; असल आदेश मायने रखता है।

  • राज्य CEO, ERO और BLO

    घर-घर जाते हैं, नोटिस देते हैं, सुनवाई करते हैं, हर नाम पर फ़ैसला करते हैं।

    स्थानीय गलती या अनुशासनात्मक कार्रवाई नतीजा दिखाती है, ज़रूरी नहीं कि मंशा या राज्यव्यापी पैटर्न।

  • सुप्रीम कोर्ट

    पारदर्शिता के आदेश दिए, दस्तावेज़ बढ़ाए, SIR को वैध ठहराया, नई याचिकाएं सुनता है।

    SIR को वैध ठहराने से हर व्यक्तिगत विलोपन या आरोप तय नहीं होता।

  • राजनीतिक दल

    दावे करते हैं, विरोध करते हैं, अदालत जाते हैं; उनके एजेंट (BLA) सूची के काम पर नज़र रख सकते हैं।

    दावा तभी निष्कर्ष बनता है जब कोई आधिकारिक रिकॉर्ड, अदालत या दोहराया जा सकने वाला ऑडिट उसका समर्थन करे।

  • पुलिस और SIT

    FIR दर्ज करती हैं और कथित धोखाधड़ी की जांच करती हैं, जैसे आलंद में।

    FIR या आरोपपत्र दोषसिद्धि नहीं है।

  • केंद्र सरकार

    सार्वजनिक रूप से आयोग और SIR का बचाव करती है; संसद में सवालों के जवाब देती है।

    देखे गए स्रोतों से यह नहीं दिखता कि सरकार ने कोई ख़ास विलोपन करवाया।

शब्द जो बार-बार आएंगे

SIR
विशेष गहन पुनरीक्षण: घर-घर जाकर मतदाता सूची की पूरी दोबारा जांच।
SSR
विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण: सालाना नियमित अपडेट, मुख्यतः आवेदनों के ज़रिए।
EPIC
मतदाता फ़ोटो पहचान पत्र — वोटर आईडी नंबर।
BLO
बूथ लेवल अधिकारी: स्थानीय अधिकारी जो घर-घर जाकर फ़ॉर्म इकट्ठा करता है।
BLA
बूथ लेवल एजेंट: दल का प्रतिनिधि जो सूची के काम पर नज़र रख सकता है।
ERO / AERO
(सहायक) निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी: नाम जोड़ने-हटाने का फ़ैसला करता है।
CEO
राज्य का मुख्य निर्वाचन अधिकारी; दूसरी अपील सुनता है।
फ़ॉर्म 6 / 7 / 8
नाम जोड़ना / किसी नाम पर आपत्ति या हटाना / प्रविष्टि सुधारना या स्थानांतरित करना।
अनमैप्ड
मौजूदा प्रविष्टि जो पुरानी संदर्भ सूची से नहीं जुड़ी — एक फ़्लैग, निष्कर्ष नहीं।
तार्किक विसंगति
बेमेल (जैसे उम्र का अंतर) के लिए सॉफ़्टवेयर फ़्लैग; सत्यापन ज़रूरी।
ASDD
अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, दोहरा — नाम छोड़ने के आम कारण।
ECINET / ERONET
सूची के आवेदन और फ़ैसले दर्ज करने वाला आयोग का सॉफ़्टवेयर।

अब भी अनसुलझा

हम अब भी क्या नहीं जानते

  1. हर राज्य में अंत में कितने लोग हटे, और किस कारण से (मृत, स्थानांतरित, दोहरा, गैर-नागरिक, अनमैप्ड, अन्य)?

  2. “तार्किक विसंगति” और अनमैप्ड मतदाताओं के सॉफ़्टवेयर फ़्लैग किन नियमों और सीमाओं पर चलते हैं?

  3. पश्चिम बंगाल की लगभग 37 लाख लंबित अपीलें कैसे निपटेंगी, और कितने मतदाता बहाल होंगे?

  4. उत्तर प्रदेश में पीलीभीत जैसी राज्यव्यापी समीक्षा में क्या मिला — सॉफ़्टवेयर की ख़राबी या जानबूझकर की गई एंट्री?

  5. आलंद मामले में मुकदमा कब शुरू होगा, और अदालत क्या पाएगी?

  6. क्या सुप्रीम कोर्ट INDIA गठबंधन की याचिका या CEC के फ़ैसलों वाली याचिका पर कोई राहत देगा?

  7. क्या अब तक रिपोर्ट हुए इलाकों से आगे, किसी समुदाय को राज्यभर में निशाना बनाने का स्वतंत्र सबूत है?

स्रोत रजिस्टर

सारे स्रोत, एक जगह (78)

पहले मूल दस्तावेज़ और आधिकारिक बयान, फिर अदालत की रिपोर्टें, जांच और ख़बरें। मूल स्रोत खोलें और दावे से मिलाएं।

यह गाइड कैसे काम करती है

हमारा तरीका

  • हम चार सवाल अलग रखते हैं जिन्हें लोग अक्सर मिला देते हैं: सूची की गुणवत्ता, मतदाता की पात्रता, फ़ॉर्म 7 का दुरुपयोग, और क्या चुनाव नतीजे बदले गए।
  • हर प्रविष्टि पर सबूत का लेबल है। आरोप तब तक आरोप रहते हैं जब तक कोई आधिकारिक रिकॉर्ड, अदालत या दोहराया जा सकने वाला ऑडिट उनकी स्थिति न बदले।
  • हम दावा और जवाब साथ-साथ दिखाते हैं, और बताते हैं कि क्या अब भी अज्ञात है।
  • हम किसी दल या SIR प्रक्रिया का समर्थन या विरोध नहीं करते। अगर किसी जुड़े हुए स्रोत में हमारे सार से अलग बात हो, तो स्रोत को सही मानें।
आधिकारिक रिकॉर्डचुनाव आयोग, राज्य CEO, सरकार या विधानसभा का रिकॉर्ड
अदालतअदालत का आदेश, फ़ैसला या याचिका
जांचFIR, SIT या आरोपपत्र — दोषसिद्धि नहीं
रिपोर्टपत्रकारों द्वारा दर्ज; कानूनी निष्कर्ष नहीं
आरोपकिसी दल या नेता का दावा, अभी परखा नहीं गया
विवादितविश्वसनीय विवरण आपस में टकराते हैं
आधिकारिक जवाबकिसी दावे पर प्राधिकारी का उत्तर
निर्धारितआगे की तारीख के लिए घोषित

तथ्य इस तारीख तक जांचे गए: . यह एक स्वतंत्र जन-सूचना साइट है, आयोग का आधिकारिक प्रकाशन या कानूनी सलाह नहीं। अपना नाम जांचने के लिए आधिकारिक मतदाता पोर्टल देखें।

voters.eci.gov.in पर अपना नाम जांचें